Monday 27 July 2020

SAHIR.. GHAZAL.. DEKHA HAI ZINDAGI KO KUCHH...

देखा है ज़िन्दगी को कुछ इतने क़रीब से।
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से। 
I have seen life from so near. 
All faces do so strange appear. 
ऐ रूहे अस्र जाग, कहाँ सो रही है तू। 
आवाज़ दे रहे हैं, पयंबर सलीब सै।
O soul of age! Where are you asleep?
From cross, the prophet is calling near.
इस रेंगती हयात का कब तक उठाएँ बार। बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब से।
How long to bear this life that crawls. 
The sick 'n healer now do not cheer.
हर गाम पे हैं मज्म ए उश्शाक़ मुंतज़िर। 
मक़्तल की राह मिलती है कूए हबीब से। 
 A group of lovers awaits at each step.
Lover's lane is a way togallows, is clear
इस तरह ज़िन्दगी ने दिया है हमारा साथ। जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से। 
Life has been with me in a way. As one lives with a rival in fear.
कहने को दिल की बात जिन्हें ढूँढते थे हम। 
महफ़िल में आ गए हैं वो अपने नसीब से। One with whom I wanted a hearty talk. 
Luckily, she did in this gathering appear. 
नीलाम हो रहा था किसी नाज़नीं का प्यार। 
क़ीमत नहीं चुकाई गई एक ग़रीब से। 
On auction was the love of a delicate one. 
Price couldn't be paid by a poor peer. 
तेरी वफ़ा की लाश पर ला मैं ही डाल दूँ। 
रेशम का ये कफ़न जो मिला है रक़ीब से। 
Let me cover the corpse of your loyalty. 
With silken coffin to you from rival O dear. 

No comments:

Post a Comment