Sunday 16 May 2021


मैं जिस को लिखने के अरमान में जिया अब तक।
वरक़ वरक़ वो फ़साना बिखर गया यारो। 

With a desire to pen it I lived so far. 
Page by page that story scattered O chums!

हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुँधला। 
हर एक ज़ख़्म मिरे दिल का भर गया यारो। 

All the marks of desire turned foggy. 
All wounds of heart have healed O chums. 

हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ है। 
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें। 
Why each meeting leads to separation finale. 
Now all the time does this hurt prevail.

न जिस का नाम है कोई न जिस की शक्ल है कोई।
इक ऐसी शै का क्यूँ हमें अज़ल से इंतिज़ार है? 

Neither it has a name nor a face on chart. 
Why am I waiting for such a thing from start? 

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