Thursday, 31 March 2022

TETRADS.......

निंदिया ! संग सजन के आजा।
वर्ना जिधर तेरे मन में, जा।
बिछुड़ी रह, तू भी साजन सम।
बन्द मिलें उन बिना, नयन मम।
..... रवि मौन.....

कल तक इच्छा थी, तू आए।
जब जाना, बलमा नहीं आए। 
कैसे तुझ को गले लगाऊँ ? 
निंदिया ! उनका स्थान दिखाऊँ ? 
..... रवि मौन..... 

मुझे देखना, रूठे कब तक ? 
साँस मेरी चलती है जब तक ! 
निर्मोही ! तब तक मत आना। 
चिंता का, बस बिंदु हटाना ! 
..... रवि मौन..... 

नैनम् को न एनम् , दिखना ! 
अर्थ शब्द का जी भर चखना। 
मैं आत्मा हूँ, तन तेरा है। 
मुझ से लेले, जो तेरा है ! 
..... रवि मौन..... 

किसे सताएगा फिर आकर ? 
अश्रु, आँख में किसके पाकर ? 
तू, यूँ ही मुस्करा सकेगा ? 
किसे, हृदय से लगा सकेगा ? 
..... रवि मौन..... 

जो तेरे मन में है, कर ले। 
अधर, अ धर ही मेरे रहेंगे। 
किस को अपनी व्यथा सुनाऊँ ? 
सुन लूँगी, जो लोग कहेंगे ! 
..... रवि मौन..... 

कर्ण न रण से कभी भगेगा ! 
प्राण त्याग देगा, न सुनेगा। 
सुनी न माँ की, ना भगवन् की। 
सुनी मित्र की, या फिर मन की ! 
..... रवि मौन..... 

तुम मेरे हो, हाँ, यह सच है। 
किंतु आयु ही देह-कवच है। 
इसे बीतने देने का फल। 
भोगेंगे हम दोनों प्रतिपल। 
..... रवि मौन..... 


Wednesday, 30 March 2022

TETRADS AND MORE......... . RAVI MAUN

: उस ने कल रात ये बरसात के बादल से कहा।
मेरे महबूब की आँखों सा बरस, तो मानूँ।
कैसे हैं मेरे ये हालात, दूर बैठे हुए।
पढ़ सको मन की अगर बात सजन, तो जानूँ।
..... रवि मौन..... 

जानू-जानू को ही सुनने को गए कान तरस।
अब भी न आओगे सजन, बीत गए इतने बरस।
घेरे बैठे हैं मेरे मन को, घेरे बाहों के।
कैसे समझाऊँ , कि जलता है बदन, आहों से।
..... रवि मौन.....

तुम न समझोगे, कि समझौते की आदत ही नहीं।
मैं ही झुक जाती हूँ, लो अब तो बग़ावत भी नहीं।
आ भी जाओ नयन सूख गए बरस बरस।
और बाहों में चले आने को तन तरस तरस।
कह रहा है तुम्हें निर्मोही, भला कैसे सुनूँ ?
और कब तक कहो ये सपने हवा में ही बुनूँ ?
...... रवि मौन......

ये वहम ही तो है तेरे मन का।
इस जगत में नहीं कुछ पराया। 
आस टूटी तो विश्वास टूटा।
साँस टूटी, हुआ तन पराया।
..... काव्य रूप..... रवि मौन.....


Monday, 28 March 2022

RAVI MAUN... TETRADS........

निंदिया क्यूँ न आजकल आती ?
क्या प्रियवर की याद सताती ?
 याद, नींद तो सौतन सी हैं।
एक रहे, दूजी क्यूँ आती ?

मैं तो रंग रँगी साजन के। 
वो मालिक हैं मेरे मन के। 
नींद नहीं आती, ना आए।
साजन मन में रहें समाए। 

कौन याद आता है ? कहिए।
ऐसे गुमसुम से मत रहिए। 
याद आएँ बाहों के घेरे।
कहिए, क्या है बस में मेरे ?

कल यह पूछ रही थी बहना। 
क्यों गुमसुम हो ? सचमुच कहना। 
क्या जीजू की याद सताती ? 
कैसे, मैं सच उसे बताती ? 

वो घर में सब को कह देती। 
हँस - हँस कर फिर ताने देती। 
दीदी ! अपने घर आई हो। 
मगर याद उनकी लाई हो। 

मैं क्या कुछ भी नहीं तुम्हारी ? 
तू उनकी सारी की सारी। 
मैं जीजू के साथ लड़ूँगी। 
सारी  ना ले जाने दूँगी। 

साली हूँ, कुछ मान रखेंगे। 
मेरे सम्मुख ना कह देंगे। 
झुठ कह रहे हैं, मैं जानूँ। 
मर्दों को कुछ मैं भी जानूँ ! 

हे भगवन् ! क्या बोल गई मैं ? 
किस प्रवाह में डोल गई मैं ? 
जीजू ! कोई बात नहीं है। 
नैनों में बरसात नहीं है। 

तुम जानो या जीजी जाने। 
मैं क्यों तुम्हें दे रही ताने ? 
दीदी का भी हाल यही है। 
पर क्या उचित सवाल नहीं है ? 

इतने दिन के बाद मिले हैं। 
कुछ यादों के कँवल खिले हैं। 
बिसरी, वो बातें बचपन की। 
क्यों न कहें हम अपने मन की ? 

 मन अधिकार - क्षेत्र दूजे का ! 
यही लड़ाई है जीजू से है। 
कुछ तो हक़ मेरा बहना पर ? 
यह भरपाई जीजू से है ? 

मन की पूरी बात कहूँगी। 
जो बोलोगे, वो सुन लूँगी। 
नहीं मगर चुप रहने वाली। 
तुम जीजू हो, तो मैं साली। 

[ Chaudhri: कब मैं लिखता तुझ को पाती ? 
नहीं याद कब तेरी आती ? 
मेरे जन्म - जन्म के साथी !
याद ख़ुशी भी, ग़म भी लाती ! 
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48 Ravindra Kumar Chaudhri: किसी रास्ते, किसी मोड़ पर।
जहाँ गए तुम मुझे छोड़ कर।
मैं देखूँगा कब तक रस्ता ?
लिख जाते तुम पृष्ठ मोड़ कर !
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: नहीं कँटीला, पथ जीवन का।
साथी हो गर, अपने मन का।
नव-विवाहिता, पीहर आई।
पूजन करती, ध्यान सजन का ! 
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: मेरे साथी ! भोले-भाले।
हर विपदा से तुझे संभाले।
याद तुम्हारी जब-जब आती।
शर्माती मैं, कभी लजाती !
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: कैसे टूटे, ध्यान सजन का ?
यह तो मोती है, जीवन का।
माता ! मैं कैसे समझाऊँ ?
याद आई, जब कंगन खनका ! 
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: अच्छा है, ऋतु है गर्मी की।
यही बात है कुछ नर्मी की।
पूजन, यदि सर्दी में होता। 
नव-विवाहितों का मन रोता !
..... रवि मौन: अब भी घर से मोह बहुत है।
मन में मगर विछोह बहुत है।
नव-विवाहिता के, मानस पर।
पूजन का विद्रोह, बहुत है।
..... रवि मौन.....

[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: मैं राह बनाता हूँ , तू राह दिखाता जा।
दुनिया में किसी को तो, तू अपना बनाता जा। 
ये रीत जगत की है, ये प्रीत जगत की है।
जो भूल गया तुझको, तू उसको भुलाता जा।
.. ... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: मैं आज किसी निर्जन जंगल में नहीं आया।
इक मित्र के घर बैठा, इक मित्र के घर आया।
जिस जगह मिले साथी, कुछ अपने पुराने से।
गूँजे वहीं ठहाके, मिल जुल के वहीं खाया।
...... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: किसे फ़िक्र है, कल क्या होगा ?
जो भी होगा, अच्छा होगा।
यह तो फल है, किसी जन्म का।
इस से प्यारा, भ्रम क्या होगा ?
...... रवि मौन.......
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: मैंने जो कुछ बोया, काटा।
इसी तरह, यह जीवन काटा।
दोष, दोश पर औरों के हों।
क्या पाया था और क्या बाँटा ?
...... रवि मौन......
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: किस किस के सम्मुख रोएगा ?
कौन घाव तेरे धोएगा ?
अपने जब अपनापन खोएँ।
पथ में फूल मित्र बोएगा।
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: मित्र ! सदा ही तेरी जय हो।
जीवन तेरा, मंगलमय हो।
जो भी कंटक, पथ में आएँ।
मुझे सामने, अपने पाएँ।
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: कब मैं लिखता तुझ को पाती ? 
नहीं याद कब तेरी आती ? 
मेरे जन्म - जन्म के साथी !
याद ख़ुशी भी, ग़म भी लाती ! 
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: किसी रास्ते, किसी मोड़ पर।
जहाँ गए तुम मुझे छोड़ कर।
मैं देखूँगा कब तक रस्ता ?
लिख जाते तुम पृष्ठ मोड़ कर !
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: नहीं कँटीला, पथ जीवन का।
साथी हो गर, अपने मन का।
नव-विवाहिता, पीहर आई।
पूजन करती, ध्यान सजन का ! 
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: मेरे साथी ! भोले-भाले।
हर विपदा से तुझे संभाले।
याद तुम्हारी जब-जब आती।
शर्माती मैं, कभी लजाती !
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: कैसे टूटे, ध्यान सजन का ?
यह तो मोती है, जीवन का।
माता ! मैं कैसे समझाऊँ ?
याद आई, जब कंगन खनका ! 
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: अच्छा है, ऋतु है गर्मी की।
यही बात है कुछ नर्मी की।
पूजन, यदि सर्दी में होता। 
नव-विवाहितों का मन रोता !
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: अब भी घर से मोह बहुत है।
मन में मगर विछोह बहुत है।
नव-विवाहिता के, मानस पर।
पूजन का विद्रोह, बहुत है।
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: माँ से मिलने का मन भी था।
लेकिन हृदयांगन में पी था।
इतनी जल्दी पूजन आया ? 
बालम पूरे बदन समाया ! 
..... रवि मौन.....
[28/03, 09:48] Ravindra Kumar Chaudhri: अभी नाक में महक तुम्हारी।
अभी हृदय में चहक तुम्हारी।
पूजन ! तुम्हें अभी आना था ?
यूँ दोनों को तरसाना था ?
..... रवि मौन.....



Thursday, 24 March 2022

MUNEER NIAZI KE ASHAAR..........

आ गई याद शाम ढलते ही
बुझ गया दिल चराग़ जलते ही  

As evening waned, the memories raided.
 As lamp was alit, heart 
light got faded. 


ख़याल जिस का था मुझे ख़याल में मिला मुझे
सवाल का जवाब भी सवाल में मिला मुझे 

He was  in my thought, I met him in thought.
 I had asked a question, answer question brought. 

नींद का हल्का गुलाबी सा ख़ुमार आँखों में था
यूँ लगा जैसे वो शब को देर तक सोया नहीं 

Intoxicated, light rosy eyes, in sleepy sight
It appears, he has not slept well, last night. 

आदत ही बना ली है तुम ने तो 'मुनीर' अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना 

O 'Muneer'! You 've crafted a habit of your own. 
Any city you dwell in, a tired look is shown. 

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने
इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या

 what's my status before world to show 
Am a dream, if scattered, none 'd know. 

कुछ वक़्त चाहते थे कि सोचें तिरे लिए
तू ने वो वक़्त हम को ज़माने नहीं दिया 

I wanted some time to think about you. 
O world ! That time wasn't given by you. 

ख़्वाब होते हैं देखने के लिए
उन में जा कर मगर रहा न करो 

Dreams are there to see. 
Don't stay in these, O thee. 


ख़्वाहिशें हैं घर से बाहर दूर जाने की बहुत
शौक़ लेकिन दिल में वापस लौट कर आने का था 

There are desires to go very far and roam. 
But heart, always longed to get back home. 

वो जिस को मैं समझता रहा कामयाब दिन
वो दिन था मेरी उम्र का सब से ख़राब दिन 

The day which I thought was  successful day. 
When pondered, it turned out
life's worst day. 

जानते थे दोनों हम उस को निभा सकते नहीं
उस ने वादा कर लिया मैं ने भी वादा कर लिया

Both of us knew, it would always be due. 
She promised and I said, "same to you". 

REKHTA TODAY'S 5 COUPLETS



तसव्वुर ज़ुल्फ़ का है और मैं हूँ 
बला का सामना है और मैं हूँ
.... लाला माधव राम जौहर.... 

I am and there's thought of tress. 
I am and there's trouble to address  ! 

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं 
दुनिया वाले दिल वालों को औnर बहुत कुछ कहते हैं।... हबीब जालिब.... 

Calling me a vagabond, is no big blame. 
People with heart are given many a name. 

दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं 
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं।..... क़तील शफ़ाई...... 

I am well known, with the heart blame. 
Now, men recognize me with your name. 

गुज़रे हज़ार बादल पलकों के साए साए 
उतरे हज़ार सूरज इक शह-नशीन- ए-दिल पर।....... अहमद मुश्ताक़............. 

A thousand clouds passed under eye-lash shade. 
Landing on  heart's throne, thousand suns made. 

ग़ज़ब तो ये है मुक़ाबिल खड़ा है वो मेरे 
कि जिस से मेरा तअल्लुक़ है ख़ूँ के रिश्ते का।.... ताब असलम..... 

It's strange, that against him, I have to face. 
Whose blood relation , I can not efface.. 

 
 




क़तील शिफ़ाई
 



अहमद मुश्ताक़
 

Tuesday, 22 March 2022

BASHIR BADR.... GHAZAL.. KAUN AAYA RASTE AAIINA-KHANE HO GAYE......

कौन आया, रास्ते आईना - ख़ाने हो गए।
रात रौशन हो गई दिन भी सुहाने हो गए। 

Who came, that house of mirrors was the route.
Well lit is night, days pleasantly cute.

क्यों हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़सोस हो ?
सैकड़ों बेघर परिन्दों के ठिकाने हो गए ।

 Why should I grieve for shattered mansion ?
It's home to hundreds of birds uproot. 

जाओ इन कमरों के आईने उठा कर फेंक दो। 
बे-अदब ये कह रहे हैं, हम पुराने हो गए।

Go and throw mirrors from these rooms. 
These uncivilized say, "we are old to suit !" 

ये भी मुमकिन है कि मैंने उसको पहचाना नहीं। 
अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए। 

It's possible, I have failed to recognise her. 
Much time has distanced us  en route. 

मेरी पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन थे। 
उनकी पलकों से गिरे मोती के दाने हो गए। 

Love insult, were tears on my eyelashes. 
Falling from her eyes, were pearls, so cute. 

BASHIR BADR... GHAZAL.. AZMATEN SAB TIRI KHUDAAI KI.......

अज़्मतें सब तिरी ख़ुदाई की ! 
हैसियत क्या मिरी इकाई की ? 

Grandeurs have Godly frame  ! 
Does my status have a claim  ? 

मेरे होंटों के फूल सूख गए। 
तुम ने क्या मुझसे बे-वफ़ाई की ! 

Flowers of my lips dried out. 
When  faithless you became ! 

सब मिरे हाथ पाँव लफ़्ज़ो के। 
और आँखें भी रोशनाई की। 

My limbs are made of words. 
Eyes too have ink, to frame. 

 मैं ही मुल्जिम हूँ, मैं ही मुंसिफ़ हूँ ।
कोई सूरत नहीं रिहाई की। 

I am culprit, judge as well. 
No way can freedom claim. 

इक बरस ज़िन्दगी का बीत गया। 
तह जमी एक और काई की। 

   One year of life is spent. 
One more mossy layer to claim.

अब तरसते रहो ग़ज़ल के लिए। 
तुम ने लफ़्ज़ों से बे-वफ़ाई की। 

Now  long  to compose a ghazal. 
With words, faithless you became. 

Monday, 21 March 2022

REKHTA TODAY'S 5 COUPLETS

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़।
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।............ मिर्ज़ा ग़ालिब...............

Just looking at her, there's splendor on my face. 
She thinks that patient is  recovering at good pace.

हुआ है तुझ से बिछड़ने के बाद ये मालूम।
कि तू नहीं था, तिरे साथ एक दुनिया थी।
............. अहमद फ़राज़..............

After parting with you, it came to my view. 
It wasn't only you, it was a world with you. 

मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस ।
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।............. जौन एलिया...............

I am very strange, well, strange to the range. 
Have ruined myself, yet no malice for the change. 

तू अगर पास नहीं है, कहीं मौजूद तो है। 
तेरे होने से, बड़े काम हमारे निकले। 
............. अहमद मुश्ताक़.............. 

If you aren't near, yet you are somewhere. 
Your being's eased my tasks everywhere. 

 'मुनीर' ! अच्छा नहीं लगता ये तेरा। 
किसी के हिज्र में बीमार होना। 

O'Munir' ! It isn't good, not your pick. 
That in one's separation, you are sick. 

GHAZAL... .. BASHIR BADR.... KHANDANI RISHTON MEN AKSAR RAQABAT HAI BAHUT...

खानदानी रिश्तों में अक्सर रक़ाबत है बहुत।
घर से निकलो तो ये दुनिया ख़ूबसूरत है बहुत। 

Often in family relations,  rivalry is there. 
Leave home, world is beautiful out there.

अपने कालिज में बहुत मग़रूर जो मशहूर है। 
दिल ये कहता है कि उस लड़की में चाहत है बहुत। 

Famous in college as a haughty girl, but heart. 
Feels, that girl has a lot of liking over there.

उनके चेहरे चाँद तारों की तरह रौशन रहे। जिन ग़रीबों के यहाँ हुस्न-ए-क़नाअत है बहुत।

Their faces were aglow like moon 'n stars.
Poor with beauty of tolerance, over there. 

हम से हो सकती नहीं दुनिया की दुनिया दारियाँ। 
इश्क़ की दीवार के साए में राहत है बहुत। 
I am unable to follow these worldly norms. 
In shade of love- wall, lot of comfort is there.

धूप की चादर, मिरे सूरज से कहना, भेज दे।
ग़ुरबतों का दौर है, जाड़ों में शिद्दत है बहुत।

Ask my sun to send sheets of sunlight.
In  eviction phase , lot of cold is out there.

उन अंधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मीं। रात से तन्हा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत।

While earth was terrified with darkness, all over. 
Solo fight with night, glowworm has courage there. 

Sunday, 20 March 2022

रिश्तों में झुकना कम-ज़ोरी नहीं मियाँ। स

रिश्तों में झुकना कम-ज़ोरी नहीं मियाँ ।
सूरज भी तो ढलता है चन्दा के लिए। 
........ काव्य रूप   रवि मौन......

जो कहने का साहस ना हो, लिख लेता हूँ।
बौझ हृदय का कुछ कुछ हल्का हो जाता है।..... रवि मौन

सच कहा है, दो बदन इक जान हैं हम ऐ सनम ।
तेरे सीने पर बने हैं ज़ख़्म जो नाखून से ।
वो पराई नार के हाथों हुए मेरे नहीं। 
क्यों मुझे पहुँचा रहे हैं दुःख, न कुछ इस में भरम। 
सच कहा है, दो बदन इक जान हैं हम ऐ सनम ।.... रवि मौन....... 

सुंदर, चंचल, प्यारी बिटिया, जब इस घर में आई। 
ग़म ग़ैरों के हुए, ख़ुशी अपने हिस्से में आई। 

कौन साथ देता है जग में, सब कहने की बातें हैं ।
जीवन- संध्या आते - आते, जीवन-साथी चला गया।..... रवि मौन..... 

कैसे तुम को अपने मन की व्यथा 
सुनाऊँ ? 
सब कुछ, सब से, कह देते हो, तुम भी
 ना !.... काव्य रूप ..... रवि मौन.......

देवकी- गर्भ से जन्मे श्रीहरि, औ' जसुदा-घर लालन। 
जीव-ताप पूतना का हरें औ' गोवर्धन- धारण। 
कंस मार, कौरव समाप्त कर, कुंतिसुतों का पालन। 
युद्ध-भूमि में भगवद्गीता कहते श्री नारायण।.
.... हिन्दी पद्यानुवाद... रवि मौन..... 

प्रथम राम ने किया वन-गमन, सोने का मृग मारा। 
वैदेही का हरण, जटायु - मरण, सुग्रीव उबारा। 
वालि-मरण, सागर-तरण, लंक-पुरी को जारा। 
रावण - कुम्भकर्ण मारे, यह है रामायण - सारा। 
..... हिन्दी पद्यानुवाद..... रवि मौन.... 

कैसे मन के भाव छुपा हम लेते हैं। 
मन में है कुछ और, बता कुछ देते हैं। 

शब्दों को कहने की कारीगरी नहीं। 
अपने को भी, यह ही समझा लेते हैं। 

मैं तेरी हूँ, सीने से लग, बोली थी। 
माला दूजे को ही पहना देते हैं। 

अपना कर लेने की इतनी होड़ लगी। 
पूरा ख़त्म, दूसरे को कर देते हैं। 

दुनिया बस्ती विस्थापित लोगों की है। 
दिल में किस को जगह मगर हम देते हैं ? 

आज अर्थ पर सारी दुनिया आश्रित है। 
अर्थ मगर कुछ और लगा हम लेते हैं। 

बड़ी बड़ी बातें करते हो क्यों तुम 'मौन' 
तुम को आईना दिखला हम देते हैं ! 
.... रवि मौन.. 


नज़रों ने नज़रबंद किया, ख़्वाब में तुझे ।
दिल ने नज़र उतार ली, नज़राना दे दिया। 
......... रवि मौन......... 




Friday, 18 March 2022

चाहे राम कहो या कृष्ण कहो, मतलब तो उसी भगवान से है।........ भजन

चाहे राम कहो या कृष्ण कहो मतलब तो उसी भगवान से है ।.........

यमुना के तट पर वस्त्र हरण, माखन चोरी, गौ संग विचरण।
निश्छल मन से राधिका रमण, मुरली की सुमधुर तान से है।
चाहे राम कहो या कृष्ण कहो, मतलब तो उसी भगवान से है ।

वन वन भटकें दशरथ नंदन, श्री हर करते जिनका वंदन।
कण्टकमय पथ, रघुकुल चंदन, भार्या के अनुसंधान से है।
चाहे राम कहो या कृष्ण कहो, मतलब तो उसी भगवान से है ।

बालकपन से रिपुदल भंजन, ऋषि पत्नी को जब किया नमन। 
तज शिला-रूप कर हरि वंदन, यह कथा अहिल्या- मान से है। 
चाहे राम कहो या कृष्ण कहो, मतलब तो उसी भगवान से है ।

हाथों के कंगन पहचानूँ,  कैसे संभव है मैं जानूँ ? 
मैं तो  पद - नख को ही मानूँ, परिचित नूपुर गुंजान से है ।
चाहे राम कहो या कृष्ण कहो, मतलब तो उसी भगवान से है ।

जब कृष्ण करें गोकुल से गमन, राधा से अंतिम बार मिलन। 
मुरली तज देवकी- नंदन बन, अब कंस-दण्ड अभियान से है। 
चाहे राम कहो या कृष्ण कहो, मतलब तो उसी भगवान से है ।


REKHTA TODAY'S 5 COUPLETS

हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'।
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं। 
.............. दाग़ देहलवी................ 

O'Daagh' ! In love, are thousand works of joyous part.
While those who do nothing, perform the works of art.

उदासी रक़्स-ए-हिजरत कर रही है।
हमेशा के लिए वो जा रहा है। 
............... विरल देसाई................ 

Sadness is performing the departural dance. 
He is leaving out for good, 
this instance. 

कटी है उम्र किसी आबदोज़ कश्ती में। 
सफ़र तमाम हुआ और कुछ नहीं देखा। 
......... इफ़्तिख़ार नसीम........... 

On a submarine, my whole life is over.
I have seen nothing and journey is over. 

जो वक़्त जाएगा वो पलट कर न आएगा। दिन रात चाहिए सहर-ओ-शाम का लिहाज़।......... नूह नारवी......... 

The time that will go, will never return so. 
Day night you respect, as morn' ' n eve' expect. 

जल्वा-ओ-दिल में फ़र्क नहीं, जल्वे को ही अब दिल कहते हैं। 
यानी इश्क़ की हस्ती में आग़ाज़ तो है अंजाम नहीं।.... फ़ानी बदायूनी....... 

Show ' n heart are not separate, now heart is show in a state. 
It means that in love world., there's start but no end, mate ! 



Thursday, 17 March 2022

GHAZAL.. FARHAT AHSAAS..... HAR GALII KOOCHE MEN RONE KI SADAA MERI HAI....

हर गली कूचे में रोने की सदा मेरी है 
शहर में जो भी हुआ है वो ख़ता मेरी है 

In every lane, weeping sound is my cry. 
What's happening in the city, at fault am I. 

ये जो है ख़ाक का इक ढेर बदन है मेरा 
वो जो उड़ती हुई फिरती है क़बा मेरी है 

This heap of dust is my own body. 
It's my dress that you see flying high. 

वो जो इक शोर सा बरपा है अमल है मेरा 
ये जो तन्हाई बरसती है सज़ा मेरी है 

My sentence spreads as the silence here. 
It's my  deed,whose noise sounds high. 

मैं न चाहूँ तो न खिल पाए कहीं एक भी फूल 
बाग़ तेरा है मगर बाद-ए-सबा मेरी है 

If I don't want, nowhere 'll flower  bloom. 
My breeze blows in your garden with a sigh. 

एक टूटी हुई कश्ती सा बना बैठा हूँ 
न ये मिट्टी न ये पानी न हवा मेरी है

Neither earth nor water nor air is mine. 
Like a broken ship, I am sitting near by. 



Wednesday, 16 March 2022

SARWAR AALAM RAAZ.. GHAZAL.... BE-KAIF JAWAANI HAI, BE-DARD ZAMAANA HAI...

बे-कैफ़ जवानी है बे-दर्द ज़माना है 
नाकाम-ए-मोहब्बत का इतना ही फ़साना है 

Youth is sad and the world is cruel. 
For failed love tale, this is reviewal. 

सावन का महीना है मौसम भी सुहाना है 
आ जाओ जो आना है आ जाओ जो आना है 

Season is rainy, weather is pleasant. 
Come if you like and like renewal. 

ऐ काश कोई कह दे उस चश्म-ए-फ़ुसूँ-गर से 
नज़रों का चुराना ही नज़रों का मिलाना है 

Let someone tell those magician's eyes. 
Stealing self from vision is visual jewel. 

आग़ाज़-ए-मोहब्बत से अंजाम-ए-मोहब्बत तक 
''इक आग का दरिया है और डूब के जाना है'

From start of love to it's virtual end. 
River is on fire, swimming under it duel. 

PARVEEN SHAKIR.. GHAZAL

तेरी ख़ुशबू का पता करती है। 
मुझ पे एहसान हवा करती है

In your fragrance endeavor. 
The wind does me a favour. 
 
चूम कर फूल को आहिस्ता से
मोजज़ा बाद-ए-सबा करती है

So gently kissing the flower. 
The breeze gives it a cover. 

खोल कर बंद-ए-क़बा गुल के हवा
आज ख़ुश्बू को रिहा करती है

Opening  flower dress, wind. Outs fragrance from cover. 

अब्र बरसते तो इनायत उस की
शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है

Cloud rains or His grace. 
Twig is just prayer lover. 

ज़िंदगी फिर से फ़ज़ा में रौशन
मिशअल-ए-बर्ग-ए-हिना करती है

Life again lights all over. 
As henna leaf lays cover

हम ने देखी है वो उजली साअत
रात जब शेर कहा करती है

I 've seen lighted bad time. 
When night is couplet doer

शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
गुफ़्तुगू तुझ से रहा करती है

Often in silence of night
Our talks are not over. 

दिल को उस राह पे चलना ही नहीं
जो मुझे तुझ से जुदा करती है

Heart won't go that way. 
Which parts us O lover ! 

ज़िंदगी मेरी थी लेकिन अब तो
तेरे कहने में रहा करती है

Life was mine but now 
It's under your word cover

उस ने देखा ही नहीं वर्ना ये आँख
दिल का अहवाल कहा करती है

You didn't see but the eye
 Says heart news all over

मुसहफ़-ए-दिल पे अजब रंगों में
एक तस्वीर बना करती है

Well written on the heart
A picture appears in colour

बे-नियाज़-ए-कफ़-ए-दरिया अंगुश्त
रेत पर नाम लिखा करती है

Wanting nothing from river
Writes name on sand cover. 

देख तू आन के चेहरा मेरा
इक नज़र भी तिरी क्या करती है

Come, look at my face. 
Your glimpse 'n this favour

ज़िंदगी भर की ये ताख़ीर अपनी
रंज मिलने का सिवा करती है

Life time date of ours
Grows meeting grief all over 

शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
कूचा-ए-जाँ में सदा करती है

With eve' one man's memory
With love lane sounds hover. 

मसअला जब भी चराग़ों का उठा
फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है

When problem is with lamps
Only wind decides favour

मुझ से भी उस का है वैसा ही सुलूक
हाल जो तेरा अना करती है

He deals with me just as
Your ego conditions your.....1 The ego stamps you over......2

दुख हुआ करता है कुछ और बयाँ
बात कुछ और हुआ करती है

Stated pain is different
From what's the matter, lover


REKHTA TODAY'S 5 COUPLETS

आरज़ू, हसरत, और उम्मीद, शिकायत, आँसू।
इक तिरा ज़िक्र था और बीच में क्या क्या निकला।.... सरवर आलम राज़......

Complaint, tear, wish, unfulfilled desire 'n hope.
Your mention alone had in it all this scope.

यूँ चार दिन की बहारों के क़र्ज़ उतारे गए
तुम्हारे बाद के मौसम फ़क़त गुज़ारे गए।
............ मनोज अज़हर..........

Four days of spring debt was cleared this way. 
Seasons after you, were just passed anyway.

 बड़े सीधे-सादे बड़े भोले-भाले।
कोई देखे इस वक़्त चेहरा तुम्हारा।
..... आग़ा शायर क़ज़लबाश.......

Very simple, very innocent, wow !
Looking at your face, 'll say now.

लम्हा लम्हा रोज़ सँवरने वाला तू। 
लम्हा लम्हा रोज़ बिखरने वाला मैं। 
...... जावेद अकरम फ़ारूक़ी........

Every moment of the day, you rectify. 
Every moment, daily, do scatter I. 

मिरी मुश्किल मिरी मुश्किल नहीं है। 
वसीला तेरी आसानी का मैं हूँ। 
.......... ख़ुर्शीद तलब.......  ....

My difficulty is not my own unease.
I am the one recommending your ease. 

Tuesday, 15 March 2022

BASHIR BADR... GHAZAL... APNE PAHAAD GHAIR KE GULZAAR HO GAYE.......

अपने पहाड़ ग़ैर के गुलज़ार हो गये।
ये भी हमारी राह की दीवार हो गये। 

For rivals, our hills became gardens to greet. 
Stone-walled our way, forced
 us to retreat. 

फल पक चुका है शाख़ पे गर्मी की धूप में 
हम अपने दिल की आग में तैयार हो गये। 
 Fruit is ripe on branch in summer sun. 
We got cooked in  fire of heart upbeat. 

हम पहले नर्म पत्तों की इक शाख़ थे मगर
काटे गये हैं इतने कि तलवार हो गये। 

Earlier, I was a twig with soft leaves. 
Sliced many times, to be sword in heat. 

बाज़ार में बिकी हुई चीज़ों की माँग है
हम इस लिए ख़ुद अपने ख़रीदार हो गये

There's demand of pre-sold things in mart. 
So I have purchased myself 
In  street. 

ताज़ा लहू भरा था सुनहरे गुलाब में। 
इंकार करने वाले गुनह-गार हो गये। 

Fresh blood was filled within golden rose. 
One who denied, became sinner replete. 

जो सरकशों के पाँव की ज़ंजीर थे कभी 
अब बुज़दिलों के हाथ में तलवार हो गये

They were foot-chains for heads held high. 
Are swords in hands of cowards in street. 



REKHTA TODAY'S 5 COUPLETS

हुई न आम जहाँ में कभी हुकूमत-ए-इश्क़ 
सबब ये है कि मोहब्बत ज़माना-साज़ नहीं
........... इक़बाल........

Never was love in world on the emperor 's list.
So love is not opportunist, pops up the gist.

ये चराग़ जैसे लम्हे कहीं राएगाँ न जाएँ 
कोई ख़्वाब देख डालो कोई इंक़िलाब लाओ..... राही मासूम रज़ा..... 

 These lighted moments, let us just not waste. 
Why not revolt or see some dream in haste ? 
 
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले 
हँसी आ रही है तिरी सादगी पर 
गोपाल मित्तल

It's my life that you are praying for. 
I am laughing, how simple you are. 
 
हुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वाले 
तमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकले........ इक़बाल.......

Those swimming under water, got a watery grave. 
They became pearls, who faced the slaps of wave.

अग़्यार क्यूँ दख़ील हैं बज़्म-ए-सुरूर में 
माना कि यार कम हैं पर इतने तो कम नहीं........ इस्माइल मेरठी..........

In this ecstatic meeting, why are rivals there ?
Agreed that friends were less, but not so rare. 

Monday, 14 March 2022

REKHTA TODAY'S 5 COUPLETS

कुछ नहीं चाहिए तुझ से मिरी ऐ उम्र-ए-रवाँ।
मिरा बचपन, मिरे जुगनू, मिरी गुड़िया 
 ला दे।..... नोशी गिलानी........

I want nothing from you, O years long gone ! 
Give childhood, glow-worms 'n  puppet-zone.

हर घड़ी इक नया तक़ाज़ा है। 
दर्द-ए-सर बन गया बदन मेरा।
............ अमीक़ हनफ़ी..........

Every time, there is a new demand.
My body became a head-ache, grand.

तमाम शहर की आँखों में रेज़ा रेज़ा हूँ। 
किसी भी आँख से उठता नहीं मुकम्मल मैं।.......... फ़रहत अहसास.......... 

In whole city eyes, I am chunk of sand particles here. 
No eye has the capacity to pick me up fully, O dear ! 

आँखों में कैसे तन गई दीवार-ए-बे-हिसी। 
सीनों में घुट के रह गई आवाज़ किस तरह
 ?.......अमजद इस्लाम अमजद.......... 

A feeling-less wall has stretched in the eyes. 
How voice got stifled in chest, knew skies ! 

तमन्ना है ये दिल में जब तलक है दम में दम अपने।
'ज़फ़र' मुँह से हमारे नाम उन का दम-ब-दम निकले।... बहादुर शाह ज़फ़र..

As long as I am alive, let survive this heart desire. 
O 'Zafar'! From my lips, let
 only her name rapid - fire. 


Sunday, 13 March 2022

REKHTA TODAY'S 5 COUPLETS

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं 
दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं।.... हबीब तालिब.......

Just calling me desolate, is no big blame O mate !
World calls people of heart, by many names in mart. 

शौक़िया कोई नहीं होता ग़लत 
इस में कुछ तेरी रज़ा मौजूद है 
अब्दुल हमीद अदम

No one just likes to be wrong. 
Your wish gives tune to song. 
 
 
पुराने अहद में भी दुश्मनी थी 
मगर माहौल ज़हरीला नहीं था 
अज़हर इनायती
 
 We were enemies es earlier as well. 
But poisonous wasn't the spell. 

सवाल करती कई आँखें मुंतज़िर हैं यहाँ 
जवाब आज भी हम सोच कर नहीं आए 
..  ... आशुफ़्ता चंगेज़ी....... 
Enquiring, awaiting, several eyes are here. 
I haven't come prepared with answers dear. 
 
तअल्लुक़ है न अब तर्क-ए-तअल्लुक़ 
ख़ुदा जाने ये कैसी दुश्मनी है 
........ कामिल बहज़ादी....... 

Neither a relation, nor break up fraud ! 
What kind of enmity is this O God ? 
 

HABEEB JAALIB... GHAZAL..AB GUNAAH-O-SAWAAB BIKTE HAIN........

अब गुनाह-ओ-सवाब बिकते हैं।
मान लीजे जनाब ! बिकते हैं।

Now sins, pious deeds are on sale. 
O man ! Accept, these are on sale.

पहले पहले ग़रीब बिकते धे।
अब इज़्ज़त म आब बिकते हैं।

Earlier, only  poor people were sold. 
Now respectable too, are on sale.

बे-ज़मीरों की राजनीती में।
जाह-ओ-मंसब, ख़िताब, बिकते हैं।

In the politics of soul-less men
Titles, posts 'n ranks are on sale.

शैख़, वाइज़, वज़ीर और शायर। 
सब यहाँ पर जनाब बिकते हैं। 

Priest, preacher, prime-post ' n
poet.
Gentleman ! Here, all are on sale.

दौर था, इंक़लाब आते थे।
आज-कल, इंक़लाब बिकते हैं। 

Earlier, revolts brought change.
Now, revolutions are on sale. 

दिल की बातें ' हबीब ' झूटी हैं।
दिल भी खाना-ख़राब ! बिकते हैं।

O' Habeeb ' ! Heart - talks are false.
Spoilt-one ! Even hearts are on sale. 

रवि मौन...... केवट प्रसंग

राम कहें, केवट तूने तोड़ा मेरा अभिमान ।
मिला सहारा भक्त का, खड़े रहे भगवान।

भीगा पग मम हाथ पर, सर पर रखिए हाथ। 
मिले मुझे आशीश यूँ, तर जाऊँ रघुनाथ। 

इस जल का सेवन करूँ मैं, मेरा परिवार। 
पितरों का तर्पण करूँ इस से अंतिम बार।

लिया आपने हे हरि, कछुए का अवतार।
मैं परिजन था, छू सका पैर न किसी  बार। 

Saturday, 12 March 2022

HASTIMAL HASTI.5.. COUPLETS

ख़्वाब में तेरा आना-जाना पहले भी था आज भी है ।
तुझ से इक रिश्ता अन-जाना पहले भी था आज भी है ।

Your visit in my dreamy spell. It was earlier, now as well. 
An unknown relation with you, it was earlier, now as well. 

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है। 
नए परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

Composing first letter of love, well it takes some time. 
For fledglings to take a flight, well, it takes some time.

हर बार न मिलने की क़सम खा के मिले हम। 
अपने ही इरादों पे अमल क्यों नहीं होता ? 

We promised not to meet, but still met again. 
Our own promises, why can't we maintain ? 

लब पे नहीं आती सब बातें। 
ख़ामोशी को भी समझा कर। 

All talks do not reach the lips. 
Understand some silence tips. 

सोच समझ सब ताक़ पे रख कर। 
प्यार में बच्चों सा मचला कर। 

Keep your intellect on a niche. 
In love, wayward childish slips. 


HASTIMAL HASTI.. GHAZAL.. KHWAB MEN TERA AANA....

ख़्वाब में तेरा आना-जाना पहले भी था आज भी है 
तुझ से इक रिश्ता अन-जाना पहले भी था आज भी है 

Your visit in my dreamy spell, it was earlier, now as well. 
Unknown relation with you, it was earlier, now as well. 

रंग बदलती इस दुनिया में सब कुछ बदल गया लेकिन 
मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है 

In this world of changing color, all things change, not a lover. On my lips is your love tale, it was earlier, now as well. 

अपने दुख-सुख कह लेना कभी हँस लेना कभी रो लेना 
तन्हाई से अपना याराना पहले भी था आज भी है 

Talking about my joy 'n pain, crying' n then laughing again. 
My kinship with solitude, it
 was earlier, now as well. 

जिस पंछी की परवाजों में जोश-ए-जुनूँ भी शामिल हो 
उस की ख़ातिर आब-ओ-दाना पहले भी था आज भी  है

In the flight of some bird, if there is frenzy unheard. 
For that bird, food 'n shelter, it was there, now as well. 

राह-ए-वफ़ा में ख़ार बहुत हैं, फूल नहीं हैं 
' हस्ती'जी
प्यार का दुश्मन सारा ज़माना, पहले भी था, आज भी है 

O' Hasti'ji ! In love route, there are thorns, no flower cute. 
World as a whole is anti-love,
 it was earlier, now as well. 

Friday, 11 March 2022

REKHTA TODAY'S 5 COUPLETS

हम तुम में कल दूरी भी हो सकती है। वज्ह कोई मजबूरी भी हो सकती है।
......... बेदिल हैदरी........ 

Tomorrow, we may be distant, apart. 
A compulsion may be reason to part.

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है। 
नए परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।.......... . हस्तीमल हस्ती.............

Writing first love letter, well, it takes some time.
 For fledgling birds to fly, well, it takes some time.

ऐ परिंदों ! याद करती है तुम्हें पागल हवा। रोज़ इक नौहा सर-ए-शाख़ शजर सुनता हूँ मैं।........ इरफ़ान सिद्दीक़ी...........

O birds ! The mad, mad breeze remembers you.
Daily, a sad tune from  tree branch, I listen too.

 है हर्फ़ हर्फ़ ज़ख़्म की सूरत खिला हुआ। 
फ़ुरसत मिले तो तुम मिरा दीवान देखना। 
............. . ज़ुबैर फ़ारूक़.............. 

Each word is open like a wound sublime. 
See my ghazal collection, if you have time. 

मैं घर को फूँक रहा था बड़े यक़ीन के साथ। 
कि तेरी राह में पहला क़दम उठाना था। 
............... अख़्तर शुमार.............. 

I was setting my house on fire, unshaken. 
In your pursuit, first step was to be taken. 


NIDAA FAAZLI......... COUPLETS

निदा फ़ाज़ली के शेर

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FAVORITE

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है

इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

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कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

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हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना

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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो

ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

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बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे

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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए

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दुश्मनी लाख सही ख़त्म कीजे रिश्ता

दिल मिले या मिले हाथ मिलाते रहिए

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कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन

फिर इस के ब'अद थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर

हम लबों से कह पाए उन से हाल-ए-दिल कभी

और वो समझे नहीं ये ख़ामुशी क्या चीज़ है

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कुछ भी बचा कहने को हर बात हो गई

आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई

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उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मालूम था

सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

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कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है

सब ने इंसान बनने की क़सम खाई है

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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

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    बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता

    जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता

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    यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें

    इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

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    तुम से छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान था

    तुम को ही याद किया तुम को भुलाने के लिए

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    उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा

    वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा

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    दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है

    मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है

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    हर एक बात को चुप-चाप क्यूँ सुना जाए

    कभी तो हौसला कर के नहीं कहा जाए

    सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो

    सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

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    दिल में हो जुरअत तो मोहब्बत नहीं मिलती

    ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती

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    सब कुछ तो है क्या ढूँडती रहती हैं निगाहें

    क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता

    • टैग्ज़ : घर 
      और 3 अन्य
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    वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में

    जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता

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    एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक

    जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा

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    इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम बुझे

    रौशनी ख़त्म कर आगे अँधेरा होगा

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    फ़ासला नज़रों का धोका भी तो हो सकता है

    वो मिले या मिले हाथ बढ़ा कर देखो

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    नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूँढिए

    इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई

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    गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया

    होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया

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    बदला अपने-आप को जो थे वही रहे

    मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे

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      अब ख़ुशी है कोई दर्द रुलाने वाला

      हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला

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        यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता

        मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो

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        जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया

        बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया

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        हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा

        मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा

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          अब किसी से भी शिकायत रही

          जाने किस किस से गिला था पहले

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            कुछ लोग यूँही शहर में हम से भी ख़फ़ा हैं

            हर एक से अपनी भी तबीअ'त नहीं मिलती

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              मेरी ग़ुर्बत को शराफ़त का अभी नाम दे

              वक़्त बदला तो तिरी राय बदल जाएगी

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                हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी

                फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

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                  बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने

                  किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

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                  बहुत मुश्किल है बंजारा-मिज़ाजी

                  सलीक़ा चाहिए आवारगी में

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                    मुमकिन है सफ़र हो आसाँ अब साथ भी चल कर देखें

                    कुछ तुम भी बदल कर देखो कुछ हम भी बदल कर देखें

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                      वही हमेशा का आलम है क्या किया जाए

                      जहाँ से देखिए कुछ कम है क्या किया जाए

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                        ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है

                        जिस जगह रहिए वहाँ मिलते-मिलाते रहिए

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                        कुछ तबीअ'त ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत हुई

                        जिस को चाहा उसे अपना सके जो मिला उस से मोहब्बत हुई

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                          पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है

                          अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

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                          कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें

                          छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

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                            ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई

                            जो आदमी भी मिला बन के इश्तिहार मिला

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                              ख़ुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को

                              बदलते वक़्त पे कुछ अपना इख़्तियार भी रख

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                                यक़ीन चाँद पे सूरज में ए'तिबार भी रख

                                मगर निगाह में थोड़ा सा इंतिज़ार भी रख

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                                  किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से

                                  हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा

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                                  किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं

                                  तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

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                                    रिश्तों का ए'तिबार वफ़ाओं का इंतिज़ार

                                    हम भी चराग़ ले के हवाओं में आए हैं

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                                      बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में

                                      छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया

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                                        अपने लहजे की हिफ़ाज़त कीजिए

                                        शेर हो जाते हैं ना-मालूम भी

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                                        बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं

                                        किसी तितली को फूलों से उड़ाया जाए

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                                          हम भी किसी कमान से निकले थे तीर से

                                          ये और बात है कि निशाने ख़ता हुए

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                                            दुनिया जीत पाओ तो हारो आप को

                                            थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे

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                                              कहता है कोई कुछ तो समझता है कोई कुछ

                                              लफ़्ज़ों से जुदा हो गए लफ़्ज़ों के मआनी

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                                                एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा

                                                जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला

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                                                  इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी

                                                  रात जंगल में कोई शम्अ जलाने से रही

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                                                    ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं

                                                    फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है रोना है

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                                                      मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं

                                                      जुदा जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन ज़ंजीरें हैं

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                                                        ख़ुश-हाल घर शरीफ़ तबीअत सभी का दोस्त

                                                        वो शख़्स था ज़ियादा मगर आदमी था कम

                                                        •  
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                                                        ज़रूरी क्या हर इक महफ़िल में बैठें

                                                        तकल्लुफ़ की रवा-दारी से बचिए

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                                                          हमारा 'मीर'-जी से मुत्तफ़िक़ होना है ना-मुम्किन

                                                          उठाना है जो पत्थर इश्क़ का तो हल्का भारी क्या

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                                                            दूर के चाँद को ढूँडो किसी आँचल में

                                                            ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला

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                                                            ख़तरे के निशानात अभी दूर हैं लेकिन

                                                            सैलाब किनारों पे मचलने तो लगे हैं

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                                                              ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं

                                                              ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता

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                                                                बृन्दाबन के कृष्ण कन्हय्या अल्लाह हू

                                                                बंसी राधा गीता गैय्या अल्लाह हू

                                                                  •  
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                                                                  बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ

                                                                  याद आती है! चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ

                                                                    •  
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                                                                    दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही

                                                                    दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही

                                                                      •  
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                                                                      ये काटे से नहीं कटते ये बाँटे से नहीं बटते

                                                                      नदी के पानियों के सामने आरी कटारी क्या

                                                                        •  
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                                                                        किताबें यूँ तो बहुत सी हैं मेरे बारे में

                                                                        कभी अकेले में ख़ुद को भी पढ़ लिया जाए

                                                                          •  
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                                                                          सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा

                                                                          खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई

                                                                            •  
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                                                                            तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस हो

                                                                            जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

                                                                              •  
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                                                                              हर जंगल की एक कहानी वो ही भेंट वही क़ुर्बानी

                                                                              गूँगी बहरी सारी भेड़ें चरवाहों की जागीरें हैं

                                                                                •  
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                                                                                मिरे बदन में खुले जंगलों की मिट्टी है

                                                                                मुझे सँभाल के रखना बिखर जाऊँ में

                                                                                  •  
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                                                                                  चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है

                                                                                  ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

                                                                                    •  
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                                                                                    गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम

                                                                                    हर क़लमकार की बे-नाम ख़बर के हम हैं

                                                                                      •  
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                                                                                      घी मिस्री भी भेज कभी अख़बारों में

                                                                                      कई दिनों से चाय है कड़वी या अल्लाह

                                                                                        •  
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