Tuesday, 30 August 2022

PARVEZ JAALANDHARI.. GHAZAL JIN KE HOTHON PE HANSI PAAON MEN CHHAALE HONGE.....


जिन के होंटों पे हँसी पाँव में छाले होंगे 
हाँ वही लोग तुम्हें चाहने वाले होंगे 

Those who have smile on lips and blisters on feet. 
Yes, those men must  be in your desired sheet. 

मय बरसती है फ़ज़ाओं पे नशा तारी है 
मेरे साक़ी ने कहीं जाम उछाले होंगे 

Intoxicated is the air as the wine rains. 
Somewhere my wine girl has splashed cups in heat. 

शम्अ वो लाए हैं हम जल्वा-गाह-ए-जानाँ से 
अब दो-आलम में उजाले ही उजाले होंगे 

This wine is brought  where beloved appeared. 
Now in both worlds there
 'll be light meet. 

उन से मफ़्हूम-ए-ग़म-ए-ज़ीस्त अदा हो शायद 
अश्क जो दामन-ए-मिज़्गाँ ने सँभाले होंगे 

Probably they' ll clear meaning of life griefs. 
Tears that are contained on eyelashes as a feat. 

हम बड़े नाज़ से आए थे तिरी महफ़िल में 
क्या ख़बर थी लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे

I had come to your gathering with great pride. 
I had no idea that locked lips would be a treat. 

PARVEZ JAALANDHARI.. GHAZAL SINGER AND JIN KE HOTHON PEHANSI PAAON MEN CHHAALE HONGE.....

जिन के होंटों पे हँसी पाँव में छाले होंगे 
हाँ वही लोग तुम्हें चाहने वाले होंगे 

Those who have smile on lips and blisters on feet. 
Yes, those men must  be in your desired sheet. 

मय बरसती है फ़ज़ाओं पे नशा तारी है 
मेरे साक़ी ने कहीं जाम उछाले होंगे 

Intoxicated is the air as the wine rains. 
Somewhere my wine girl has splashed cups in heat. 

शम्अ वो लाए हैं हम जल्वा-गाह-ए-जानाँ से 
अब दो-आलम में उजाले ही उजाले होंगे 

This wine is brought  where beloved appeared. 
Now in both worlds there
 'll be light meet. 

उन से मफ़्हूम-ए-ग़म-ए-ज़ीस्त अदा हो शायद 
अश्क जो दामन-ए-मिज़्गाँ ने सँभाले होंगे 

Probably they' ll clear meaning of life griefs. 
Tears that are contained on eyelashes as a feat. 

हम बड़े नाज़ से आए थे तिरी महफ़िल में 
क्या ख़बर थी लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे

I had come to your gathering with great pride. 
I had no idea that locked lips would be a treat. 

DAAGH DEHLAVI.. GHAZAL.. KHAATIR SE YAA LIHAAZ SE MAIN MAAN TO GAYAA...

Monday, 29 August 2022

नहीं मिलते हैं दो किनारे हैं,
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दरिया बहते इसी सहारे हैं।
 
इश्क़ में लोग स्वाद लेते हैं,
अगरचे अश्क होते खारे हैं।
 
शब-ए-फ़िराक़ के सभी लम्हे,
हमने तन्हा कहाँ गुज़ारे हैं।
 
ज़िन्दगी होती नहीं ला-फ़ानी,
किसलिए करते इस्तिख़ारे हैं।
 
हिज्र में अपना ग़म नहीं हमको,
बहुत उदास चाँद-तारे हैं।
 
सुब्ह-दम निकले लौटने के लिए,
और कहते रहे बंजारे हैं।
 
राख जैसे बुझे से चेहरे हैं,
दिल में जलते हुए अंगारे हैं।
 
मिल गए तो दुआ-सलाम किया,
निभाए जाते भाई-चारे हैं।

साथ जाते हैं लोग चार क़दम,
कूच के जब बजे नक़्क़ारे हैं।
 
काम कोई अटक गया होगा,
बाद मुद्दत के वो पधारे हैं।
 
पार एक रोज़ वो भी जायेंगे,
अभी बैठे जो इस किनारे हैं।
 
ज़बाँ पे लफ़्ज़ तल्ख़ हैं लेकिन,
नज़र में अलहदा इशारे हैं।
 
हाथ खाली हैं हमारे दोनों,
चाँद के पास सब सितारे हैं।
 
वक़्त ने ज़ख़्म सुखाए 'गौतम',
हमने नाखून से निखारे हैं।

-डॉ. कुँवर वीरेन्द्र विक्रम सिंह गौतम
1

Sunday, 28 August 2022

FIRAQ GORAKHPURI. GHAZAL.. NARM FAZAA KI KAR ATEN DIL KO DUKHAA KE RAH GAEEN...

नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं 
ठंडी हवाएँ भी तिरी याद दिला के रह गईं 

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास 
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं 

मुझ को ख़राब कर गईं नीम-निगाहियाँ तिरी 
मुझ से हयात ओ मौत भी आँखें चुरा के रह गईं 

हुस्न-ए-नज़र-फ़रेब में किस को कलाम था मगर 
तेरी अदाएँ आज तो दिल में समा के रह गईं 

तब कहीं कुछ पता चला सिद्क़-ओ-ख़ुलूस-ए-हुस्न का 
जब वो निगाहें इश्क़ से बातें बना के रह गईं 
 
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तेरे ख़िराम-ए-नाज़ से आज वहाँ चमन खिले 
फ़सलें बहार की जहाँ ख़ाक उड़ा के रह गईं 

पूछ न उन निगाहों की तुर्फ़ा करिश्मा-साज़ियाँ 
फ़ित्ने सुला के रह गईं फ़ित्ने जगा के रह गईं 

तारों की आँख भी भर आई मेरी सदा-ए-दर्द पर 
उन की निगाहें भी तिरा नाम बता के रह गईं 

उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें आह ये ग़म की ठोकरें 
ये भी तो बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता के शाने हिला के रह गईं 

और तो अहल-ए-दर्द कौन सँभालता भला 
हाँ तेरी शादमानियाँ उन को रुला के रह गईं 

याद कुछ आईं इस तरह भूली हुई कहानियाँ 
खोए हुए दिलों में आज दर्द उठा के रह गईं 

साज़-ए-नशात-ए-ज़िंदगी आज लरज़ लरज़ उठा 
किस की निगाहें इश्क़ का दर्द सुना के रह गईं 
तुम नहीं आए और रात रह गई राह देखती 
तारों की महफ़िलें भी आज आँखें बिछा के रह गईं 

झूम के फिर चलीं हवाएँ वज्द में आईं फिर फ़ज़ाएँ 
फिर तिरी याद की घटाएँ सीनों पे छा के रह गईं 

क़ल्ब ओ निगाह की ये ईद उफ़ ये मआल-ए-क़ुर्ब-ओ-दीद 
चर्ख़ की गर्दिशें तुझे मुझ से छुपा के रह गईं 

फिर हैं वही उदासियाँ फिर वही सूनी काएनात 
अहल-ए-तरब की महफ़िलें रंग जमा के रह गईं 

कौन सुकून दे सका ग़म-ज़दगान-ए-इश्क़ को 
भीगती रातें भी 'फ़िराक़' आग लगा के रह गईं 


GULZAAR AFREEN.. GHAZAL.. NA POOCHH AI MIRE GHAM-KHAAR KYAA TAMANNAA THII...

न पूछ ऐ मिरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी 
दिल-ए-हज़ीं में भी आबाद एक दुनिया थी 

Don't ask O sad heart, what did I want ? 
Within the sad heart was a world implant. 

हर इक नज़र थी हमारे ही चाक-दामाँ पर 
हर एक साअत-ए-ग़म जैसे इक तमाशा थी 

Each glance was on my tattered clothes. 
As if each moment of pain 
was a grant. 

हमें भी अब दर ओ दीवार घर के याद आए 
जो घर में थे तो हमें आरज़ू-ए-सहरा थी 

Now, me too remembered home walls 'n door. 
While at home, there was
 in me desert haunt. 

कोई बचाता हमें फिर भी डूब ही जाते 
हमारे वास्ते ज़ंजीर मौज-ए-दरिया थी 

If someone 'd save, I 'd drown even then. 
For me the river waves did shackles implant. 

बग़ैर सम्त के चलना भी काम आ ही गया 
फ़सील-ए-शहर के बाहर भी एक दुनिया थी 

Roaming aimlessly too, was of some help. 
Outside city walls, was a world to flaunt. 

तिलिस्म-ए-होश-रुबा थे वो मंज़र-ए-हस्ती 
फ़ज़ा-ए-दीदा-ओ-दिल जैसे ख़्वाब आसा थी 

Mind blowing were those scenes of life. 
Weather of eye 'n heart was  morn' raag chant. 

कोई रफ़ीक़-ए-सफ़र था न राहबर कोई 
जुनूँ की राह में 'गुलनार' जादा-पैमा थी 

There was no rival and no highway man. 
The frenzy path, 'Gulnaar' had  to survey  'n haunt. 


Saturday, 27 August 2022

AKBAR ALAAHAABAADI... COUPLETS....

पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा 
लो आज हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए 

When lawyer was born, the satan so proclaimed. 
From now on, as God's son, 
me too will be named. 

मैं भी ग्रेजुएट हूँ तुम भी हो ग्रेजुएट 
इल्मी मुबाहिसे हों ज़रा पास आ के लेट 

I am a graduate, you are a graduate. 
Sleep nearby for discussion
 O mate! 

 
बी.ए भी पास हों मिले बी-बी भी दिल-पसंद 
मेहनत की है वो बात ये क़िस्मत की बात है 

She should be B. A. and a pleasing wife mate. 
That was hard work, this
 is a matter of fate. 

कोट और पतलून जब पहना तो मिस्टर बन गया 
जब कोई तक़रीर की जलसे में लीडर बन गया 

Putting coat and pent on, he became a mister. 


डिनर से तुम को फ़ुर्सत कब यहाँ फ़ाक़े से कब ख़ाली 
चलो बस हो चुका मिलना न तुम ख़ाली न हम ख़ाली 


FIRAQ GORAKHPURI.. 26....COUPLETS


एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें 
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं 

Since long your memories didn't knock the door. 
And that I have forgotten 
you, isn't so any more. 
 
 
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं 
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं 

I can feel her footfall very well ahead. 
O life ! I can recognize you far ahead. 
 
कोई समझे तो एक बात कहूँ 
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं 

If one understands, I can tell in time. 
 Love is fortune, not an act of crime. 
 
तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो 
तुम को देखें कि तुम से बात करें 

You are addressing me and
 are so near. 
 Should I look at you or talk with, O dear. 
 
हम से क्या हो सका मोहब्बत में 
ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की 

In love, could I do any more? 
You were faithless to the core. 
  
ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त 
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में 

O friend ! Somehow I have spent my life days. 
Whether to remember you
or forget in many ways. 
 
शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास 
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं 

Smoky was the evening and beauty was sad. 
Some tales to heart came in memorial clad. 

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़' 
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए 

'Firaaq' came to the tavern in a pleasant mood. 
After drinking , all he could do, was brood. 
 
अब तो उन की याद भी आती नहीं 
कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयाँ 

Now even memories do not knock. 
How solitary is the solitude  stock? 
 
 रात भी नींद भी कहानी भी 
हाए क्या चीज़ है जवानी भी 

The night, the story and sleep. 
What a thing is youth to peep! 
 
ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त 
तिरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई 

After mating, look into mirror O friendly thing. 
Your virginity has taken some gorgeous fling. 
 
इक उम्र कट गई है तिरे इंतिज़ार में 
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिन से एक रात 

Waiting for you, my life is spent. 
Some haven't even a night
 spent. 
 
सुनते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं इक बुज़ुर्ग 
हम लोग भी फ़क़ीर इसी सिलसिले के हैं 

Named Love, was one old man
We are wanderers of that clan. 
 
कौन ये ले रहा है अंगड़ाई 
आसमानों को नींद आती है 

Stretching her limbs, who is she? 
Asleep are the skies, she can see. 
 
इसी खंडर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए 
इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात 

In these ruins are broken lamps somewhere. 
Very sad is the night, make use of these here. 
 
ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा 
और अगर रोइए तो पानी है 

Heart is an ember, if you try to control. 
It's water, if you cry and let it roll. 
 
लाई न ऐसों-वैसों को ख़ातिर में आज तक 
ऊँची है किस क़दर तिरी नीची निगाह भी 

It hasn't bothered about anyone till now. 
Your downcast gaze is so high somehow
 
कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में 
जुनूँ का नाम उछलता रहा ज़माने में 

Your heathen didn't lessen raising dust of cloud. 
In the name of frenzy kept making world proud. 

 अहल-ए-ज़िंदाँ की ये महफ़िल है सुबूत इस का 'फ़िराक़' ।
कि बिखर कर भी ये शीराज़ा परीशाँ न हुआ। 

O 'Firaaq' this assembly of prison is a proof of that. 
Even when scattered, this gathering didn't fall flat. 

सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं 
लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं
 
There's no frenzy in head, no desire in heart. 
Still you can't believe love break on it's part. 

बद-गुमाँ हो के मिल ऐ दोस्त जो मिलना है तुझे 
ये झिझकते हुए मिलना कोई मिलना भी नहीं 

Meet without suspicion if you want to meet me. 
O friend this hesitant meet is no way to meet me

वक़्त-ए-ग़ुरूब आज करामात हो गई 
ज़ुल्फ़ों को उस ने खोल दिया रात हो गई 

While parting, there was a miracle indeed. 
She let loose the tress and it was night indeed. 

माज़ी के समुंदर में अक्सर यादों के जज़ीरे मिलते हैं 
फिर आओ वहीं लंगर डालें फिर आओ उन्हें आबाद करें 

There are islands of  memories in the sea of past. 
Let us set tents there to inhabit these at last. 

'फ़िराक़' दौड़ गई रूह सी ज़माने में 
कहाँ का दर्द भरा था मिरे फ़साने में 

O 'Firaaq' a soul ran all over universe. 
What a pain was there ii my tale purse! 

रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए 
वाह-री ग़फ़लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम 

Slowly I became a stranger to in eyes of my own 
O oblivion, I had thought that you were my own ! 

बहसें छिड़ी हुई हैं हयात ओ ममात की 
सौ बात बन गई हैं 'फ़िराक़' एक बात की 

There are discussions in  progress between life 'n death. 
O' Firaaq a hundred talks. emerge from one in a breath. 





RAOOF RAHEEM.. GHAZAL.. JIINE KAA KUCHH USOOL NA MARNE KAA DHANG HAI...

जीने का कुछ उसूल न मरने का ढंग है 


हर छोटी-छोटी बात पे आपस में जंग है 

जब से सुना है फ़िल्म दी डे आफ़्टर का हाल 
खम्बों से हम ने बाँध के रखा पलंग है 

टी वी पे गाय भैंस पुकारेंगे रोज़ ही 
उर्दू ज़बाँ से इस में ज़ियादा तरंग है 

आया है कैसा दौर सियासत में दोस्तो 
राई भी ख़ुश नहीं है रेआया भी तंग है 

आप अपने हाथ उजाड़ न लें ये जुनूँ-परस्त 
शीशे के घर में रहते हुए मश्क़-ए-संग है 

हूरों पे है निगाह गो मरक़द में पाँव हैं 
वाइ'ज़ अख़ीर-ए-उम्र में क्या तेरा ढंग है 


DAAGH DEHLAVI.. GHAZAL.. KHAATIR SE YAA LIHAAZ SE MEIN MAAN TO GAYAA.....

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया 
झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया 

दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं 
उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया 

डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं 
सुनसान घर ये क्यूँ न हो मेहमान तो गया 

क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में 
वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया 

देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ 
ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया 

इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं 
लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया 
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गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र 
मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया 

बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा 
गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया 

होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके 
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया 


NAASIR KAAZMII.. GHAZAL.. DHOOP NIKLII DIN SUHAANE HO GAYE.....

धूप निकली दिन सुहाने हो गए

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चाँद के सब रंग फीके हो गए

क्या तमाशा है कि बे-अय्याम-ए-गुल
टहनियों के हाथ पीले हो गए

इस क़दर रोया हूँ तेरी याद में
आईने आँखों के धुँदले हो गए

हम भला चुप रहने वाले थे कहीं
हाँ मगर हालात ऐसे हो गए

अब तो ख़ुश हो जाएँ अरबाब-ए-हवस
जैसे वो थे हम भी वैसे हो गए

हुस्न अब हंगामा-आरा हो तो हो
इश्क़ के दावे तो झूटे हो गए

ऐ सुकूत-ए-शाम-ए-ग़म ये क्या हुआ
क्या वो सब बीमार अच्छे हो गए

दिल को तेरे ग़म ने फिर आवाज़ दी
कब के बिछड़े फिर इकट्ठे हो गए

आओ 'नासिर' हम भी अपने घर चलें
बंद इस घर के दरीचे हो गए 


Friday, 26 August 2022

MAKHDOOM MOINUDDIN.. GHAZAL..ROZ NIKLEGII BAAT PHOOLON KII...



फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बरात फूलों की

Last night we talked about flowers. 
Is the night marriage party of flowers? 

फूल के हार फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की

Flower garlands, bangles of flowers.
Evening of flowers, night of flowers. 

आप का साथ साथ फूलों का
आप की बात बात फूलों की

Your company is company of flowers. 
Your talks are talks about flowers. 

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं
मिल रही है हयात फूलों की

Eyes meet and the wine cups meet. 
What's meeting is the life of  flowers. 

कौन देता है जान फूलों पर
कौन करता है बात फूलों की

Who bestows life on the  flowers? 
Who continues to talk about flowers. 

वो शराफ़त तो दिल के साथ गई
लुट गई काएनात फूलों की

That decency is gone with the heart. 
Robbed is the universe of flowers

अब किसे है दिमाग़-ए-तोहमत-ए-इश्क़
कौन सुनता है बात फूलों की

Now who has a  mind to blame  love? 
Who will listen to talk about flowers? 

मेरे दिल में सुरूर-ए-सुब्ह-ए-बहार
तेरी आँखों में रात फूलों की

There's joy of spring morning in heart. 
In your eyes, there's a night of flowers. 

फूल खिलते रहेंगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की

Flowers will be bloomimg in world. 
Daily there will be a talk about flowers 


ये महकती हुई ग़ज़ल 'मख़दूम'
जैसे सहरा में रात फूलों की

This is a fragrant ghazal, 'Makhdoom' . 
In a desert, there's a night of flowers. 


Thursday, 25 August 2022

DAAGH DEHLAVI.. GHAZAL.. KHAATIR SE YAA LIHAAZ SE VOH MAAN TO GAYAA.....

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया 
झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया 

दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं 
उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया 

डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं 
सुनसान घर ये क्यूँ न हो मेहमान तो गया 

क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में 
वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया 

देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ 
ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया 

इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं 
लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया 

 
Hasya Poetry: गोपालप्रसाद व्यास की कविता- तुम कहती हो कि नहाऊँ मैं!
Kavya Desk काव्य डेस्क
हास्य
Hasya
तुम कहती हो कि नहाऊँ मैं!
क्या मैंने ऐसे पाप किए,
जो इतना कष्ट उठाऊँ मैं?

क्या आत्म-शुद्धि के लिए?
नहीं, मैं वैसे ही हूँ स्वयं शुद्ध,
फिर क्यों इस राशन के युग में,
पानी बेकार बहाऊँ मैं?

ahmad faraz urdu nazm itna sannata ki 
इतना सन्नाटा कि जैसे हो सुकूत-ए-सहरा
ऐसी तारीकी कि आँखों ने दुहाई दी है
जाने ज़िंदाँ से उधर कौन से मंज़र होंगे
मुझ को दीवार ही दीवार दिखाई दी है
दूर इक फ़ाख़्ता बोली है बहुत दूर कहीं
पहली आवाज़ मोहब्बत की सुनाई दी ह..

AHMAD FARAZ.. GHAZAL.. ABHI KUCHH AUR KARISHME GHAZAL KE DEKHTE HAIN...

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं 

'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं 

जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र 

कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं 

रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो 

सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं 

तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता 

ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं 

ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में 

जो लालचों से तुझे मुझ को जल के देखते हैं 

ये क़ुर्ब क्या है कि यक-जाँ हुए न दूर रहे 

हज़ार एक ही क़ालिब में ढल के देखते हैं 

न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई 

सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं 

ये कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले 

समुंदरों की तहों से उछल के देखते हैं 

अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए 

हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं 

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उस की ख़ैर-ख़बर 

चलो 'फ़राज़' को ऐ यार चल के देखते हैं

Wednesday, 24 August 2022

AHMAD FARAZ.. GHAZAL..

जब भी दिल खोल के रोए होंगे

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लोग आराम से सोए होंगे

बाज़ औक़ात ब-मजबूरी-ए-दिल
हम तो क्या आप भी रोए होंगे

सुब्ह तक दस्त-ए-सबा ने क्या क्या
फूल काँटों में पिरोए होंगे

वो सफ़ीने जिन्हें तूफ़ाँ न मिले
ना-ख़ुदाओं ने डुबोए होंगे

रात भर हँसते हुए तारों ने
उन के आरिज़ भी भिगोए होंगे

क्या अजब है वो मिले भी हों 'फ़राज़'
हम किसी भी ध्यान में खोए होंगे

AZIIZ BAANO DAARAAB WAFAA.... COUPLETS

एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स 

ग़ौर करते हैं तो उस का कोई चेहरा भी नहीं 

 Since long one who in my thoughts has a place. 
When I closely perceive, doesn't have any face
 
 
मेरे हालात ने यूँ कर दिया पत्थर मुझ को 
देखने वालों ने देखा भी न छू कर मुझ को 

 My conditions have turned me into a stone. 
Those who saw, didn't touch me, had gone. 
 
 
चराग़ बन के जली थी मैं जिस की महफ़िल में 
उसे रुला तो गया कम से कम धुआँ मेरा 

 In whose assembly as a candle, I had shone. 
At least my smoke made 
him cry 'n had gone. 
 
 
अहमियत का मुझे अपनी भी तो अंदाज़ा है 
तुम गए वक़्त की मानिंद गँवा दो मुझ को 

 About my capacity I can also estimate. 
You just waste me as time, out of date. 
 
 
शिव तो नहीं हम फिर भी हम ने दुनिया भर के ज़हर पिए 
इतनी कड़वाहट है मुँह में कैसे मीठी बात करें 

 I am not Shiva but still gulped poisons of universe. 
With such bitterness in mouth, how sweetly converse? 
  
 
मैं ने ये सोच के बोए नहीं ख़्वाबों के दरख़्त 
कौन जंगल में उगे पेड़ को पानी देगा 

 I didn't plant trees of thoughts with this in mind. 
Who will  water the jungle tree, one of it's kind? 
  
 
हम ऐसे सूरमा हैं लड़ के जब हालात से पलटे 
तो बढ़ के ज़िंदगी ने पेश कीं बैसाखियाँ हम को 

 After fighting with conditions when I returned brave. 
The life came forward and to me, the crutches gave. 
  
 
ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए 
मेरी आँखों में कहीं बरसात बाक़ी रह गई 

 All seasons of life came and had gone. 
In my eyes, rainy season was left alone. 
  
 
हम ने सारा जीवन बाँटी प्यार की दौलत लोगों में 
हम ही सारा जीवन तरसे प्यार की पाई पाई को 

 I distributed love goods in my life as a whole. 
Still I had longed for small bits of love as dole. 
 
 
ये हौसला भी किसी रोज़ कर के देखूँगी 
अगर मैं ज़ख़्म हूँ उस का तो भर के देखूँगी 

 Some day I will gather the courage and see. 
If I am his wound, then I will
 heal and see. 
  
 
कुरेदता है बहुत राख मेरे माज़ी की 
मैं चूक जाऊँ तो वो उँगलियाँ जला लेगा 

He scrapes ashes of my past so much. 
If I am miss, he 'll burn fingers as such. 
  
 
हमारी बेबसी शहरों की दीवारों पे चिपकी है 
हमें ढूँडेगी कल दुनिया पुराने इश्तिहारों में 

 
 Our helplessness is stuck on the city walls.
World will search for us in old poster stalls. 
 
हमें दी जाएगी फाँसी हमारे अपने जिस्मों में 
उजाड़ी हैं तमन्नाओं की लाखों बस्तियाँ हम ने 

 We will be hanged within our own  bodies in ire. 
We have ruined many hutments of nascent desire. 
  
 
मैं अपने जिस्म में रहती हूँ इस तकल्लुफ़ से 
कि जैसे और किसी दूसरे के घर में हूँ 

I live within my body with 
such regard.
As if living in else's house under guard 
 
 
मैं भी साहिल की तरह टूट के बह जाती हूँ 
जब सदा दे के बुलाता है समुंदर मुझ को 

 Me too runs fast like quivering shore of a stream. 
Whenever distant sea gives me a call to redeem. 
 
 
हम से ज़ियादा कौन समझता है ग़म की गहराई को 
हम ने ख़्वाबों की मिट्टी से पाटा है इस खाई को 

 Who can understand the depth of grief more than me? 
 I have covered this gap with the soil of dreams to see. 
 
शहर ख़्वाबों का सुलगता रहा और शहर के लोग 
बे-ख़बर सोए हुए अपने मकानों में मिले 

 City of dreams kept burning  and residents within. 
Sleepy, unconcerned in homes were  found therein. 
 
 
मैं किस ज़बान में उस को कहाँ तलाश करूँ 
जो मेरी गूँज का लफ़्ज़ों से तर्जुमा कर दे 

 In which language and where should I search? 
Who can translate my call in words to search? 
 
अपनी हस्ती का कुछ एहसास तो हो जाए मुझे 
और नहीं कुछ तो कोई मार ही डाले मुझ को 

 Let me have a feeling of some existence. 
If nothing else, let one kill me in pretense. 
   
मेरे अंदर एक दस्तक सी कहीं होती रही 
ज़िंदगी ओढ़े हुए मैं बे-ख़बर सोती रही 

 Somewhere within me 
there was a knock. 
With  life cover, I slept 
unaware of the stock. 
  
जाने कितने राज़ खुलें जिस दिन चेहरों की राख धुले 
लेकिन साधू-संतों को दुख दे कर पाप कमाए कौन 

 Many secrets will then encash, when from faces washes ash. 
 But imparting saints the pain, what sins are  for me to gain? 
 
आईना-ख़ाने में खींचे लिए जाता है मुझे 
कौन मेरी ही अदालत में बुलाता है मुझे 

Someone is dragging me within glasshouse. 
Who is calling me in my own court  house? 
 
मैं उस की धूप हूँ जो मेरा आफ़्ताब नहीं 
ये बात ख़ुद पे मैं किस तरह आश्कार करूँ 

 One who isn't my sun, that I am his light. 
How can I reveal it to myself
 in this light? 
 
उस ने चाहा था कि छुप जाए वो अपने अंदर 
उस की क़िस्मत कि किसी और का वो घर निकला 

 He wanted that within the self, he should conceal. 
Bad luck that it was another 's  house to reveal. 
 
चराग़ों ने हमारे साए लम्बे कर दिए इतने 
सवेरे तक कहीं पहुँचेंगे अब अपने बराबर हम 

 The lamps have stretched our shadows so much. 
We won't equal our size till the morning as such. 
 
तिश्नगी मेरी मुसल्लम है मगर जाने क्यूँ 
लोग दे देते हैं टूटे हुए प्याले मुझ को 

My thirst is wholesome, but I don't know why? 
People hand me over broken cups with a sigh.   
 
मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा 
पराई आग में कोई न हाथ डालेगा 

Where from would he bring me out of my ire? 
No one will burn his fingers in another's fire. 
 
मिरे अंदर ढंडोरा पीटता है कोई रह रह के 
जो अपनी ख़ैरियत चाहे वो बस्ती से निकल जाए 

 Someone is beating the drum within me times and again. 
One who wants to be safe, simply leave this domain.  
 
ज़मीन मोम की होती है मेरे क़दमों में 
मिरा शरीक-ए-सफ़र आफ़्ताब होता है 

Earth under my feet is made of wax. 
Sun over head is companion, attacks. 
 
मुझे चखते ही खो बैठा वो जन्नत अपने ख़्वाबों की 
बहुत मिलता हुआ था ज़िंदगी से ज़ाइक़ा मेरा 

He lost the heaven of his dreams with my taste. 
Very much similar to the 
life was my own taste. 
  
ज़र्द चेहरों की किताबें भी हैं कितनी मक़्बूल 
तर्जुमे उन के जहाँ भर की ज़बानों में मिले 

How famous are books of yellow faces indeed? 
It's translations had many languages to feed. 
 
धूप मेरी सारी रंगीनी उड़ा ले जाएगी 
शाम तक मैं दास्ताँ से वाक़िआ हो जाऊँगी 

The sun will blow my colours as a whole.
By evening I will be an event in story role. 
  
इस घर के चप्पे चप्पे पर छाप है रहने वाले की 
मेरे जिस्म में मुझ से पहले शायद कोई रहता था 

 There's a print of the resident all over this place.  
 May be someone else lived within my body place. 
 
गए मौसम में मैं ने क्यूँ न काटी फ़स्ल ख़्वाबों की 
मैं अब जागी हूँ जब फल खो चुके हैं ज़ाइक़ा अपना 

Why didn't I harvest my dreams at last season's beep? 
The fruits have lost their taste, when I lost my sleep. 
 
ख़्वाब दरवाज़ों से दाख़िल नहीं होते लेकिन 
ये समझ कर भी वो दरवाज़ा खुला रक्खेगा 

 Although the dreams don't come through the open door. 
He knows it, but still will  keep open the door, all the more. 
 
उम्र भर रास्ते घेरे रहे उस शख़्स का घर 
उम्र भर ख़ौफ़ के मारे न वो बाहर निकला 

Life long the routes encircled his home. 
Life long, out of fear, he didn't leave home. 
 
ज़िंदगी भर मैं खुली छत पे खड़ी भीगा की 
सिर्फ़ इक लम्हा बरसता रहा सावन बन के 

 Life long I got soaked, standing on rooftop. 
Only for a moment, did 
he pour a raindrop. 
  
हम हैं एहसास के सैलाब-ज़दा साहिल पर 
देखिए हम को कहाँ ले के किनारा जाए 

We are on the shore of feeling flooded stream. 
Let's see where does the shore keep its esteem? 

वक़्त हाकिम है किसी रोज़ दिला ही देगा 
दिल के सैलाब-ज़दा शहर पे क़ब्ज़ा मुझ को 

Time is a judge, will someday grant. 
Control of flooded heart city implant. 
 
  
 
मिरे अंदर से यूँ फेंकी किसी ने रौशनी मुझ पर 
कि पल भर में मिरी सारी हक़ीक़त खुल गई मुझ पर 

 Someone from inside threw light on me in a way. 
 Within a moment my reality was revealed so to say. 
 
मैं उस के सामने उर्यां लगूँगी दुनिया को 
वो मेरे जिस्म को मेरा लिबास कर देगा 

 I 'll appear naked to the world before him. 
He ' ll make my body my garb with a whim. 
 
मैं किसी जन्म की यादों पे पड़ा पर्दा हूँ 
कोई इक लम्हे को इक दम से उठाता है मुझे 

I am a curtain of memories of some earlier life. 
Someone suddenly lifts it for a moment' s life. 
 
मेरी ख़ल्वत में जहाँ गर्द जमी पाई गई 
उँगलियों से तिरी तस्वीर बनी पाई गई 

In my vacuum, where some dust was found. 
With fingers my portrait was
 sketched around. 
 
चमन पे बस न चला वर्ना ये चमन वाले 
हवाएँ बेचते नीलाम रंग-ओ-बू करते 

 These gardeners didn't have the garden control. 
Or auction fragrance, colours, sell winds as a whole. 
 
मर के ख़ुद में दफ़्न हो जाऊँगी मैं भी एक दिन
सब मुझे ढूँडेंगे जब मैं रास्ता हो जाऊँगी 

One day I'll die, and be buried within me. 
When I be a path, all will search for me. 
 
मेरे अंदर कोई तकता रहा रस्ता उस का 
मैं हमेशा के लिए रह गई चिलमन बन के 

 Someone within me kept looking for him. 
I have become a drapery, always for him. 
 
वफ़ा के नाम पर तैरा किए कच्चे घड़े ले कर 
डुबोया ज़िंदगी को दास्ताँ-दर-दास्ताँ हम ने 

In the name of fidelity, we swam with uncooked pitchers. 
In story after story life was drowned by us in dithers. 
 
जब किसी रात कभी बैठ के मय-ख़ाने में 
ख़ुद को बाँटेगा तो देगा मिरा हिस्सा मुझ को 

 While sitting in a tavern in a lonely night. 
Doling  self, 'll give my share 
 to me, right. 
 
उस की हर बात समझ कर भी मैं अंजान रही 
चाँदनी रात में ढूँडा किया जुगनू वो भी 

 
 
 
कोई मौसम मेरी उम्मीदों को रास आया नहीं 

फ़स्ल अँधियारों की काटी और दिए बोती रही 

 
  
 
बुझा के रख गया है कौन मुझ को ताक़-ए-निस्याँ पर 

मुझे अंदर से फूंके दे रही है रौशनी मेरी 

 
  
 
हम ने सब को मुफ़्लिस पा के तोड़ दिया दिल का कश्कोल 

हम को कोई क्या दे देगा क्यूँ मुँह-देखी बात करें 

 
  
 
मैं फूट फूट के रोई मगर मिरे अंदर 

बिखेरता रहा बे-रब्त क़हक़हे कोई 

 
 
 
सुनने वाले मिरा क़िस्सा तुझे क्या लगता है 

चोर दरवाज़ा कहानी का खुला लगता है 

 
 
 
मैं शाख़-ए-सब्ज़ हूँ मुझ को उतार काग़ज़ पर 

मिरी तमाम बहारों को बे-ख़िज़ाँ कर दे 

 
 
 
किसी जनम में जो मेरा निशाँ मिला था उसे 

पता नहीं कि वो कब उस निशान तक पहुँचा 

 
  
 
वरक़ उलट दिया करता है बे-ख़याली में 

वो शख़्स जब मिरा चेहरा किताब होता है 

 
 
 
बिछड़ के भीड़ में ख़ुद से हवासों का वो आलम था 

कि मुँह खोले हुए तकती रहीं परछाइयाँ हम को 

 
  
 
हम मता-ए-दिल-ओ-जाँ ले के भला क्या जाएँ 

ऐसी बस्ती में जहाँ कोई लुटेरा भी नहीं 

 
 
 
टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा 

वो आदमी जो मिरी दास्तान तक पहुँचा 

 
  
 
लगाए पीठ बैठी सोचती रहती थी मैं जिस से 

वही दीवार लफ़्ज़ों की अचानक आ रही मुझ पर 

 
 
 
निकल पड़े न कहीं अपनी आड़ से कोई 

तमाम उम्र का पर्दा न तोड़ दे कोई 

 
 
 
आज कम-अज़-कम ख़्वाबों ही में मिल के पी लेते हैं, कल 

शायद ख़्वाबों में भी ख़ाली पैमाने टकराएँ लोग 

 
 
 
वो मिरा साया मिरे पीछे लगा कर खो गया 

जब कभी देखा है उस ने भीड़ में शामिल मुझे 

 
 
 
इक वही खोल सका सातवाँ दर मुझ पे मगर 

एक शब भूल गया फेरना जादू वो भी 

 
 
 
मैं अपने आप से टकरा गई थी ख़ैर हुई 

कि आ गया मिरी क़िस्मत से दरमियान में वो 

 
 
 
फ़साना-दर-फ़साना फिर रही है ज़िंदगी जब से 

किसी ने लिख दिया है ताक़-ए-निस्याँ पर पता अपना 

 
  
 
पकड़ने वाले हैं सब ख़ेमे आग और बेहोश 

पड़े हैं क़ाफ़िला-सालार मिशअलों के क़रीब 

 

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा के शेर

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एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स

ग़ौर करते हैं तो उस का कोई चेहरा भी नहीं

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    मेरे हालात ने यूँ कर दिया पत्थर मुझ को

    देखने वालों ने देखा भी छू कर मुझ को

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      चराग़ बन के जली थी मैं जिस की महफ़िल में

      उसे रुला तो गया कम से कम धुआँ मेरा

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        अहमियत का मुझे अपनी भी तो अंदाज़ा है

        तुम गए वक़्त की मानिंद गँवा दो मुझ को

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          शिव तो नहीं हम फिर भी हम ने दुनिया भर के ज़हर पिए

          इतनी कड़वाहट है मुँह में कैसे मीठी बात करें

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            मैं ने ये सोच के बोए नहीं ख़्वाबों के दरख़्त

            कौन जंगल में उगे पेड़ को पानी देगा

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              हम ऐसे सूरमा हैं लड़ के जब हालात से पलटे

              तो बढ़ के ज़िंदगी ने पेश कीं बैसाखियाँ हम को

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                ज़िंदगी के सारे मौसम के रुख़्सत हो गए

                मेरी आँखों में कहीं बरसात बाक़ी रह गई

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                  हम ने सारा जीवन बाँटी प्यार की दौलत लोगों में

                  हम ही सारा जीवन तरसे प्यार की पाई पाई को

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                    ये हौसला भी किसी रोज़ कर के देखूँगी

                    अगर मैं ज़ख़्म हूँ उस का तो भर के देखूँगी

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                      कुरेदता है बहुत राख मेरे माज़ी की

                      मैं चूक जाऊँ तो वो उँगलियाँ जला लेगा

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                      हमारी बेबसी शहरों की दीवारों पे चिपकी है

                      हमें ढूँडेगी कल दुनिया पुराने इश्तिहारों में

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                        मैं जब भी उस की उदासी से ऊब जाऊँगी

                        तो यूँ हँसेगा कि मुझ को उदास कर देगा

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                          जिन को दीवार-ओ-दर भी ढक सके

                          इस क़दर बे-लिबास हैं कुछ लोग

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                            कहने वाला ख़ुद तो सर तकिए पे रख कर सो गया

                            मेरी बे-चारी कहानी रात भर रोती रही

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                              तमाम उम्र किसी और नाम से मुझ को

                              पुकारता रहा इक अजनबी ज़बान में वो

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                                मेरी तस्वीर बनाने को जो हाथ उठता है

                                इक शिकन और मिरे माथे पे बना देता है

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                                  वो ये कह कह के जलाता था हमेशा मुझ को

                                  और ढूँडेगा कहीं मेरे अलावा मुझ को

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                                    मैं रौशनी हूँ तो मेरी पहुँच कहाँ तक है

                                    कभी चराग़ के नीचे बिखर के देखूँगी

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                                      हमें दी जाएगी फाँसी हमारे अपने जिस्मों में

                                      उजाड़ी हैं तमन्नाओं की लाखों बस्तियाँ हम ने

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                                        मैं अपने जिस्म में रहती हूँ इस तकल्लुफ़ से

                                        कि जैसे और किसी दूसरे के घर में हूँ

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                                          मैं भी साहिल की तरह टूट के बह जाती हूँ

                                          जब सदा दे के बुलाता है समुंदर मुझ को

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                                            हम से ज़ियादा कौन समझता है ग़म की गहराई को

                                            हम ने ख़्वाबों की मिट्टी से पाटा है इस खाई को

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                                              शहर ख़्वाबों का सुलगता रहा और शहर के लोग

                                              बे-ख़बर सोए हुए अपने मकानों में मिले

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                                                मैं किस ज़बान में उस को कहाँ तलाश करूँ

                                                जो मेरी गूँज का लफ़्ज़ों से तर्जुमा कर दे

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                                                  अपनी हस्ती का कुछ एहसास तो हो जाए मुझे

                                                  और नहीं कुछ तो कोई मार ही डाले मुझ को

                                                    •  
                                                    •  
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                                                    मेरे अंदर एक दस्तक सी कहीं होती रही

                                                    ज़िंदगी ओढ़े हुए मैं बे-ख़बर सोती रही

                                                      •  
                                                      •  
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                                                      •  

                                                      जाने कितने राज़ खुलें जिस दिन चेहरों की राख धुले

                                                      लेकिन साधू-संतों को दुख दे कर पाप कमाए कौन

                                                        •  
                                                        •  
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                                                        आईना-ख़ाने में खींचे लिए जाता है मुझे

                                                        कौन मेरी ही अदालत में बुलाता है मुझे

                                                          •  
                                                          •  
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                                                          मैं उस की धूप हूँ जो मेरा आफ़्ताब नहीं

                                                          ये बात ख़ुद पे मैं किस तरह आश्कार करूँ

                                                            •  
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                                                            उस ने चाहा था कि छुप जाए वो अपने अंदर

                                                            उस की क़िस्मत कि किसी और का वो घर निकला

                                                              •  
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                                                              चराग़ों ने हमारे साए लम्बे कर दिए इतने

                                                              सवेरे तक कहीं पहुँचेंगे अब अपने बराबर हम

                                                                •  
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                                                                तिश्नगी मेरी मुसल्लम है मगर जाने क्यूँ

                                                                लोग दे देते हैं टूटे हुए प्याले मुझ को

                                                                  •  
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                                                                  मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा

                                                                  पराई आग में कोई हाथ डालेगा

                                                                    •  
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                                                                    मिरे अंदर ढंडोरा पीटता है कोई रह रह के

                                                                    जो अपनी ख़ैरियत चाहे वो बस्ती से निकल जाए

                                                                      •  
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                                                                      ज़मीन मोम की होती है मेरे क़दमों में

                                                                      मिरा शरीक-ए-सफ़र आफ़्ताब होता है

                                                                        •  
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                                                                        मुझे चखते ही खो बैठा वो जन्नत अपने ख़्वाबों की

                                                                        बहुत मिलता हुआ था ज़िंदगी से ज़ाइक़ा मेरा

                                                                          •  
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                                                                          ज़र्द चेहरों की किताबें भी हैं कितनी मक़्बूल

                                                                          तर्जुमे उन के जहाँ भर की ज़बानों में मिले

                                                                            •  
                                                                            •  
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                                                                            धूप मेरी सारी रंगीनी उड़ा ले जाएगी

                                                                            शाम तक मैं दास्ताँ से वाक़िआ हो जाऊँगी

                                                                              •  
                                                                              •  
                                                                              •  
                                                                              •  

                                                                              इस घर के चप्पे चप्पे पर छाप है रहने वाले की

                                                                              मेरे जिस्म में मुझ से पहले शायद कोई रहता था

                                                                                •  
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                                                                                गए मौसम में मैं ने क्यूँ काटी फ़स्ल ख़्वाबों की

                                                                                मैं अब जागी हूँ जब फल खो चुके हैं ज़ाइक़ा अपना

                                                                                  •  
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                                                                                  ख़्वाब दरवाज़ों से दाख़िल नहीं होते लेकिन

                                                                                  ये समझ कर भी वो दरवाज़ा खुला रक्खेगा

                                                                                    •  
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                                                                                    उम्र भर रास्ते घेरे रहे उस शख़्स का घर

                                                                                    उम्र भर ख़ौफ़ के मारे वो बाहर निकला

                                                                                      •  
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                                                                                      ज़िंदगी भर मैं खुली छत पे खड़ी भीगा की

                                                                                      सिर्फ़ इक लम्हा बरसता रहा सावन बन के

                                                                                        •  
                                                                                        •  
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                                                                                        हम हैं एहसास के सैलाब-ज़दा साहिल पर

                                                                                        देखिए हम को कहाँ ले के किनारा जाए

                                                                                          •  
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                                                                                          वक़्त हाकिम है किसी रोज़ दिला ही देगा

                                                                                          दिल के सैलाब-ज़दा शहर पे क़ब्ज़ा मुझ को

                                                                                            •  
                                                                                            •  
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                                                                                            मिरे अंदर से यूँ फेंकी किसी ने रौशनी मुझ पर

                                                                                            कि पल भर में मिरी सारी हक़ीक़त खुल गई मुझ पर

                                                                                              •  
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                                                                                              मैं उस के सामने उर्यां लगूँगी दुनिया को

                                                                                              वो मेरे जिस्म को मेरा लिबास कर देगा

                                                                                                •  
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                                                                                                मैं किसी जन्म की यादों पे पड़ा पर्दा हूँ

                                                                                                कोई इक लम्हे को इक दम से उठाता है मुझे

                                                                                                  •  
                                                                                                  •  
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                                                                                                  मेरी ख़ल्वत में जहाँ गर्द जमी पाई गई

                                                                                                  उँगलियों से तिरी तस्वीर बनी पाई गई

                                                                                                    •  
                                                                                                    •  
                                                                                                    •  

                                                                                                    चमन पे बस चला वर्ना ये चमन वाले

                                                                                                    हवाएँ बेचते नीलाम रंग-ओ-बू करते

                                                                                                      •  
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                                                                                                      मर के ख़ुद में दफ़्न हो जाऊँगी मैं भी एक दिन

                                                                                                      सब मुझे ढूँडेंगे जब मैं रास्ता हो जाऊँगी

                                                                                                        •  
                                                                                                        •  
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                                                                                                        मेरे अंदर कोई तकता रहा रस्ता उस का

                                                                                                        मैं हमेशा के लिए रह गई चिलमन बन के

                                                                                                          •  
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                                                                                                          वफ़ा के नाम पर पैरा किए कच्चे घड़े ले कर

                                                                                                          डुबोया ज़िंदगी को दास्ताँ-दर-दास्ताँ हम ने

                                                                                                          •  
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                                                                                                          जब किसी रात कभी बैठ के मय-ख़ाने में

                                                                                                          ख़ुद को बाँटेगा तो देगा मिरा हिस्सा मुझ को

                                                                                                            •  
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                                                                                                            उस की हर बात समझ कर भी मैं अंजान रही

                                                                                                            चाँदनी रात में ढूँडा किया जुगनू वो भी

                                                                                                              •  
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                                                                                                              फ़स्ल अँधियारों की काटी और दिए बोती रही

                                                                                                                •  
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                                                                                                                •  
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                                                                                                                बुझा के रख गया है कौन मुझ को ताक़-ए-निस्याँ पर

                                                                                                                मुझे अंदर से फूंके दे रही है रौशनी मेरी

                                                                                                                  •  
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                                                                                                                  हम ने सब को मुफ़्लिस पा के तोड़ दिया दिल का कश्कोल

                                                                                                                  हम को कोई क्या दे देगा क्यूँ मुँह-देखी बात करें

                                                                                                                    •  
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                                                                                                                    बिखेरता रहा बे-रब्त क़हक़हे कोई

                                                                                                                      •  
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                                                                                                                      सुनने वाले मिरा क़िस्सा तुझे क्या लगता है

                                                                                                                      चोर दरवाज़ा कहानी का खुला लगता है

                                                                                                                        •  
                                                                                                                        •  
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                                                                                                                        मैं शाख़-ए-सब्ज़ हूँ मुझ को उतार काग़ज़ पर

                                                                                                                        मिरी तमाम बहारों को बे-ख़िज़ाँ कर दे

                                                                                                                          •  
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                                                                                                                          किसी जनम में जो मेरा निशाँ मिला था उसे

                                                                                                                          पता नहीं कि वो कब उस निशान तक पहुँचा

                                                                                                                            •  
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                                                                                                                            वरक़ उलट दिया करता है बे-ख़याली में

                                                                                                                            वो शख़्स जब मिरा चेहरा किताब होता है

                                                                                                                              •  
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                                                                                                                              बिछड़ के भीड़ में ख़ुद से हवासों का वो आलम था

                                                                                                                              कि मुँह खोले हुए तकती रहीं परछाइयाँ हम को

                                                                                                                                •  
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                                                                                                                                ऐसी बस्ती में जहाँ कोई लुटेरा भी नहीं

                                                                                                                                  •  
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                                                                                                                                  वो आदमी जो मिरी दास्तान तक पहुँचा

                                                                                                                                    •  
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                                                                                                                                    वही दीवार लफ़्ज़ों की अचानक रही मुझ पर

                                                                                                                                      •  
                                                                                                                                      •  
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                                                                                                                                      निकल पड़े कहीं अपनी आड़ से कोई

                                                                                                                                      तमाम उम्र का पर्दा तोड़ दे कोई

                                                                                                                                        •  
                                                                                                                                        •  
                                                                                                                                        •  

                                                                                                                                        आज कम-अज़-कम ख़्वाबों ही में मिल के पी लेते हैं, कल

                                                                                                                                        शायद ख़्वाबों में भी ख़ाली पैमाने टकराएँ लोग

                                                                                                                                          •  
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                                                                                                                                          वो मिरा साया मिरे पीछे लगा कर खो गया

                                                                                                                                          जब कभी देखा है उस ने भीड़ में शामिल मुझे

                                                                                                                                            •  
                                                                                                                                            •  
                                                                                                                                            •  

                                                                                                                                            इक वही खोल सका सातवाँ दर मुझ पे मगर

                                                                                                                                            एक शब भूल गया फेरना जादू वो भी

                                                                                                                                              •  
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                                                                                                                                              मैं अपने आप से टकरा गई थी ख़ैर हुई

                                                                                                                                              कि गया मिरी क़िस्मत से दरमियान में वो

                                                                                                                                                •  
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                                                                                                                                                फ़साना-दर-फ़साना फिर रही है ज़िंदगी जब से

                                                                                                                                                किसी ने लिख दिया है ताक़-ए-निस्याँ पर पता अपना

                                                                                                                                                  •  
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                                                                                                                                                  पड़े हैं क़ाफ़िला-सालार मिशअलों के क़रीब

                                                                                                                                                    •  
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